संपादकीय

चाटुकार समाज सुधारको की बेलेश्वर गांव का अस्तित्व समाप्त करने की साजिश

समाज के स्वार्थी ठेकेदारों द्वारा एक और गाँव को बर्बाद करने की तैयारी।

एक तरफ जहाँ माननीय सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार जहाँ सड़क के किनारे बने मंदिरों को तोड़ने का हुक्म जारी हो रखा है, वहीँ दूसरी तरफ समाज के ऐसे कुछ व्यक्तियों द्वारा जो अपनी चाटुकरता वाली समाज नीति से लोगों के मन को हर लेते है और फिर वे अपने झांसे में फ़साने वाली नीति में हर बार सफल हो जाते है। अब उनकी नजर बेलेश्वर गाँव को बर्बाद करने पर आ टिकी है। बेलेश्वर गाँव बेलेश्वर महादेव की पवित्र भूमि पर एक सुन्दर बसा गाँव है। खेती बाड़ी के हिसाब से यह टेहरी जिले के केमर घाटी की सबसे उपजावू और रमणीक भूमि है। चारों और सुंदर पहाड़ों से घिरा तथा नीचे तलहटी में बालगंगा नदी इसकी सुंदरता में चार चाँद लगा देते है। भोले के भक्तों के लिए इस गाँव में कई विल्वपत्र के पेड़ है। भगवान् भोले की इस पूण्य भूमि पर अब संकट के बादल मंडराने लगे है, क्योंकि कुछ चाटुकार समाज सुधारक जिन्होंने पहले से ही अपने लिए ऋषिकेश, देहरादून जैसी जगह में आशियाने और प्लाट ले रखे है,  वे अब इस भूमि की शायद खुशहाली अब हजम नहीं कर पा रहे है, उनको किसी भी कीमत पर अपनी वाही वाही लूटनी है।
2005-06 में भी अष्टादश महापुराण के बाद भी उन्होंने कुछ ऐसी ही योजना बनायीं थी, जिसका परिणाम निकला बेलेश्वर का सामुदायिक स्वास्थय केंद्र जहाँ लघभग 30 नाली जमीन लोगों की चली गयी और कुछ परिवारों का तो मनो सबकुछ लूट गया। उस समय भी लोगों को लगा तथा अब अच्छा समय आएगा हमें अब कम से कम स्वास्थय के हिसाब से ऋषिकेश देहरादून के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे, लेकिन हुवा इसके उलट आज 11 साल बीतने के बावजूद भी बेलेश्वर के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र केवल और केवल एक तमाशा है और कुछ नहीं। जिन्होंने जमीन दान में दी उनके नाम के ऊपर उन लोगों का नाम है,  जिन्होंने चंद रुपये दिए और काश्तकारों का तो सब कुछ लूट गया ।उनको न वहां सही जगह मिली न स्वास्थ्य के नाम पर कुछ मिला, मिला तो केवल बदहाली के दिन।
आज कोई भी चाटुकार समाज सुधारक उस अस्पताल की बदहाली के लिए आगे नहीं आ रहा
जहाँ एक तरफ सरकार के मुलाजिम अपनी बनी बनायीं सड़को को आपदा रुपी कहर से गाँव और खेती बाड़ी से बचाने में नाकाम हो रहे है वही दूसरी तरफ इस सचाई की तरफ आँख बंद कर चुके तथा सत्यता की तरफ पीठ कर चुके इस समाज को स्वर्ग जेसे खवाब दिखाने वाले चाटुकार समाज सुधाकर खूब वाही वाही लूट रहे है । अब की फिर भोले नाथ की नगरी में अष्टादश महापुराण हुवा और निश्चित तौर ऐसा आयोजन होना भी चाहिए, परन्तु लगता है अबकी बार इसकी कीमत शायद बेलेश्वर गाँव को अपने अस्तित्व को खोकर चुकानी पड़ेगी।
चाटुकार समाज सुधारक बेलेश्वर गांव के ऊपर से सड़क का निर्माण कर उसे देविधार तक पहुँचाना चाहते है, ताकि वह मंदिर भी उनकी कमाई का एक अच्छा जरिया बन सके। जबकि 28 मई 2016 की आपदा चीख चीख कर एक बात का साफ़ इसारा कर रहा है की प्रकृति के साथ अनावश्यक रूप से की गयी छेड़ छाड़ गाँव का विकाश नहीं बल्कि विनाश कर देगी।
कोठियांडा गाँव  इसका जीता जागता उदहारण है, अगर इस गाँव के ऊपर सड़क नहीं बनी होती तो निश्चित रूप से यह गाँव आज पलायन न कर रहा होता। बेलेश्वर ही मात्र इस घाटी का ऐसा गाँव है जहाँ से सबसे कम पलायन पिछले विगत वर्षो में हुवा है। चाटुकार समाज सुधराक इतने स्वार्थी है की वे कभी भी ऐसे लोगों की मदद के लिए आगे नहीं आये जिन्होंने अपना सबकुछ इस क्षेत्र में शिक्षा, स्वस्थ्य और बेरोजगारी के बढ़ावे के लिए लगा दिया हो। वे केवल और केवल धर्म को बेचकर अपना वर्चस्वा कायम रखना चाहते है। खुद वे कई तरह के कार्य करते है, लेकिन दूसरों को समाज के हित में कार्य करता देख उसमे छदम रूप से और कमजोर व्यक्ति के ऊपर सामने से भी पूरी रोक लगाने की पूरी कोसिस करते है। इनका एक ही धर्म है अपना वर्चस्य हर क्षेत्र में कायम रखना। इनका मानना है की हर कोई हमारी जेब में है और इस बात के इनके पास पुख्ता प्रणाम भी है। इन्हें जो करना है करें परन्तु अगर ये अपनी कुदृष्टि भोले बाबा के गाँव की तरफ करंगे तो परिणाम केदार घाटी से भी भयंकर रूप में होंगे।

यह क्षेत्र भूस्खलन के हिसाब से अति संवेदनशील है
सड़क निर्माण करने वाली सरकरी इकाईयां अनाप शनाप जगह की सड़कों का प्रपोजल लेने की जगह पुराणी और अति जरूरि जगह की सडकों का निर्माण करे तो उसी में सर्व हिताय वाली बात साकार होगी ना की कुछ चाटुकार समाज सुधारक और कुछ स्वार्थी ठेकेदारों के बहकावे में आकर। जब माननीय सुप्रीम कोर्ट मंदिर तोड़ने का आदेश पहले ही दे चूका है तो फिर सड़क अब मंदिर कैसे जायेगी?

एक तरफ चीन हमे लालकर् रहा है दूसरी तरफ पकिस्तान और ये लोग अपने गाँव अपने देश को मजबूत करने की बजाय खुद उसको उजाड़ना चाहते है।हमारे जनप्रतिनिधि भी सरकारी धन को मंदिरों में ऐसे बाँट देते है जैसे कोई अपने बाप दादा की वर्षों पुराणी जायदाद लुटा देता है।
                नयी केदार घाटी जैसी भयंकर आपदा का निर्माण ना हो इसी लिए यह संपादकीय समर्पित है

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